Atal Bram Wani

250.00

Code : BD 1
Author :  
ISBN :
Language : Hindi / Rajasthan
Page : 120
Book Size : A5
Cover Page : Color
Inside Page : B/W
Price :
 250/- INR

Description

लेखकीय

श्रोताओं व पाठकों को स्वाद की दृष्टि से मीठी कड़वी तीखी चटपटी कैसी भी लगे, मगर कविता आत्मा की आवाज हुआ करती है। अनुभूतियों का अश्रु बनकर ढल जाना शाश्वत घटना हैं, किन्तु गहन सुख-दु:ख की धड़कनो द्वारा काव्य की पंक्तियों का सृजन होना ईश्वर प्रदत्त गुणों से ही सम्भव हैं। ऐसा मेरा अन्त: करण स्वीकार करता है। बाल्यावस्था में विधालयों में होने वाली अंत्याक्षरी प्रतियोगीताओं में मेरी आशु कविताएं सभी प्रतियोगियों के लिए गहन आश्चर्य का कारण बन जाया करती थी । काव्य-सृजन का बीजाकुर तो विधार्थी जीवन में ही हो चुका था। 10 वीं कक्षा उत्तीर्ण कर वन विभाग में फोरेस्टर के पद पर सेवाएं देते समय भी लेखनी यदा-कदा अपना जादू दिखा ही देती थी। 19 वर्ष पुर्व, जब योग दिक्षा ली तब से ही लेखन पूर्णतया आध्यात्मिक रंग में रंग चुका था ।रास्ता सुगम हो या कितना ही दुर्गम हो, कुछ राहगीर तो मिल ही जाते हैं।”रमता जोगी बहता पार्टी’ वाली लोकोक्ति को चरितार्थ करते हुए जब मैं भूपाल सागर था। तभी रा.उ.मा.वि. भूपाल सागर में कार्यरत कविराज अमृत वाणी एवं हिन्दी भाषा के प्राध्यापक श्री लक्ष्मीलाल मेनारिया (उस्ताद) से सम्पर्क हुआ। इसके पश्चात् तो मेरे आध्यात्मिक लेखन में और गति आई। साधारण भक्तजन मेरे काव्य का भरपुर आनन्द उठा सके इसलिए समग्र आध्यात्मिक साहित्य मेवाड़ी मिश्रित मारवाड़ी बोली में ही लिखा 10-11 वर्षों का समय मारवाड़ की धरती पर व्यतीत होने के कारण मारवाड़ी का प्रभाव स्पष्ट झलक रहा हैं । गुरू महिमा एवं अध्यात्म मार्ग परम आवश्यक बिन्दुओं ओर सिद्धान्तो को आधार बना कर राजस्थानी । बोली में कुछ दोहो की रचना की । जिनमें से चयनित दोहे मेनें इस प्रथम पुस्तक में लिए हैं।

कोटि-कोटि धन्यवाद देना चाहूंगा कि शिष्य एवं कविराज अमृत ‘वाणी’ चित्तौड़गढ़ और हिन्दी भाषा के सेवानिवृत प्राध्यापक मेणार (उदयपुर) निवासी श्री लक्ष्मीलाल मेनारिया (उस्ताद) ने मिलकर पुरानी डायरियों के पन्ने उलटते हुए पढ़-पढ़ कर , समझ समझ कर इन दोहों का चयन किया है। इतना ही नहीं चयनित दोहों की ऐसी सरल, सुबोध, हृदयग्राही शब्दार्थों के साथ सुन्दर व्याख्या की है। जिन्हें पढ़ने से पाठको के मन में एक भी भ्रम शेष नही रहता हैं । इन्होनें कई महीनों तक जिन हीरों को बारिकी से तराशा है वे आज आपके अन्त:करण में ब्रह्म लोक की आभा बिखरने के लिए उत्सुक

‘अटल’ कवि महन्त बालकदास अटल आश्रम राणा, तह. रोहेट जिला – पाली (राज.)

 

 

योगीराज श्री भेरालाल कुम्हार (भगतजी)

      धोती- जब्बा और सफेद पगड़ी पहने, साईकिल चलाने वाले 80 वर्षीय योगीराज, श्री भेरालाल कुम्हार (भगतजी) छींपों का आकोला (चित्तौड़गढ़) गांव में जन-जन के प्रिय हैं। आपके श्वसुर जी के आत्मीय निवेदन पर उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील के तारावट गांव के निवासी श्री फूलरामजी शर्मा ने योग-साधना का मार्ग दर्शाया । कुम्हार जाति की जाजपुरा गौत्र में जन्मे अध्यात्म मार्ग के इस अथक पथिक की फुलवारी में कुल सात (7) पुष्प खिले इनमें से एक निराले पुष्प पूर्व जन्मों के योगी को , बचपन से ही शंकर नाम से पुकारा जाता था। पिता ने अपनी योग – दृष्टि से बचपन में ही उस बाल योगी को पहचानते हुए योग शिक्षा की प्रारम्भिक जानकारियां देना प्रांरभ कर दिया । बाल्यावस्था में ही लम्बी-लम्बी जटाएं रखना, तिलक माला धारण करना सभी भावी योगी जीवन के लक्षण प्रकट होने लगे । अति साधारण घर में जीवन यापन करने वाले असाधारण योगी श्री भेरालाल कुम्हार का जीवन गृहस्थ आश्रम की विभिन्न दुर्गम घाटियों को पार करता हुआ अध्यात्म मार्ग पर लक्ष्य की ओर अनवरत बढ़ता रहा। आप दयावान, स्वाभिमानी, = तामस प्रकृति मिश्रित व्यक्तित्व के धनी हैं। उदयपुर जिले में स्थित भीण्डर के पास हवना ठिकाना में रहते हुए आपने 5वीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की । जीवन -संगिनी, बाल- बचे, जातिगत व्यवसाय, कभी भी आपके योगी जीवन में बाधक नहीं हुए।
चमत्कार दिखाना आपके जीवन का लक्ष्य कदापि नहीं रहा । फिर भी कई चमत्कार स्वत: घटित हो गए । विवाह के अवसर पर घर में ढक्कन गिलास सहित जल का भरा हुआ पीतल का कलश स्वत: प्रकट होना, प्रत्यक्ष जीवित नाग की सेवा करना आदि अनेक प्रसंग इस युग की तार्किक बुद्धिको सोचने के लिए बाध्य कर देते हैं। गीता ज्ञान आपके जीवन का प्रमुख आधार रहा। शतायु होने की हार्दिक शुभ कामनाओं के साथ एक नन्हा सा यागी कलमकार आपके चरण कमलों में प्रणाम निवेदन करता हैं |